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http://localhost:8080/xmlui/handle/123456789/1787Full metadata record
| DC Field | Value | Language |
|---|---|---|
| dc.contributor.author | महारािष्ट्रय | - |
| dc.date.accessioned | 2025-10-10T06:58:59Z | - |
| dc.date.available | 2025-10-10T06:58:59Z | - |
| dc.date.issued | 1955 | - |
| dc.identifier.uri | http://localhost:8080/xmlui/handle/123456789/1787 | - |
| dc.description | गजळापुरचे श्री, महळारळाघ्ट्रिय हें एक चतुरस्त्र लेखक आहेत. त्ग्रांनें वाचन र्दाडगें असून मासिक असते. त्यांचीप्रानौन दिद्येत्रर नितांत श्रद्धा अळाहैतरो पणतौअ'धश्रढा नव्हेम्यास्तव त्यांनीं केलेल्या संशो- घनाचीं मळोय्यतळाफाय्मोंठीअसतेहेंसांगांचयासक्को. गळीतेंतील दॉननिफा यावरंत्य‘ळानींजोचर्चात्पक निबंध लिहिलळाआट्टे,तोंपूर्वप्रहृटूषित नस्रत्तेत्पाशुद्धस’शोघनानाएक अपूर्वक्तमुनाभ्ह्रणूनम्ह्मातांमेर्डेल. गळीतेंतळील दोन निष्ठा ध्द्दणजें सांस्यपोग व कमॅयळोग ह्या होत. यांना दुसरी नांवे' ज्ञळानयळोग त्र वुद्धिपोग अणीं' दिलेनीं अस्त्रळतप्तगळीतेंत श्रीकृष्णर्ली त्रुद्धियोगाना लोप साला असल्यळादें आपणांस सांगिवलै आहे, व तो एक वेळ इक्ष्वल्लाळू व’ग्रांत प्रचलित असल्याचेही सांगितले आहे. त्याचप्रपागें जनकादिकांना कर्नपोगप्चा अवलंब क्का मोक्ष लढ्याअसेंट्वळीगक्लिञळापगांसस्पाजर्ते.परंतुहाजनक कोंणवपार्क्सयोगप्चालोंपक्कावकितोंझल्ला इत्यादि गोष्टींवि'ग्पीं गीतेंत मुग्थता धारण केलेलीआढळते. पावें एक कारणअतें दिसतें कळी त्या काळी या गोष्टी सर्वांना परिचित असल्या पाहिजेत. | en_US |
| dc.language.iso | other | en_US |
| dc.publisher | रामकृ ष्ण नारायण पाटणकर, रत्नािगरी | en_US |
| dc.subject | रामकृ ष्ण नारायण पाटणकर, रत्नािगरी | en_US |
| dc.subject | श्रीमद्भगवद्गगीतेंतील दोन िना | en_US |
| dc.title | श्रीमद्भगवद्गगीतेंतील दोन िना | en_US |
| dc.type | Book | en_US |
| Appears in Collections: | Dattu Waman Poddar | |
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| File | Description | Size | Format | |
|---|---|---|---|---|
| PNVM-5-00933-Shrimadbhagwatgitetil Don Nishtha.OCR.pdf | 72.83 MB | Adobe PDF | View/Open |
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